आंखों शायरी | Aankhon Shayari

Aankhon Shayari

आँखों आँखों में पिला दी मिरे साक़ी ने मुझे
ख़ौफ़ ए ज़िल्लत है न अंदेशा ए रुस्वाई है !

समुंदर है कोई आँखों में शायद
किनारों पर चमकते हैं गुहर से !

है मेरी आँखों में अक्स ए नविश्ता ए दीवार
समझ सको तो मिरा नुत्क़ ए बे ए ज़बाँ ले लो !

न नींद आँखों में बाक़ी न इंतिज़ार रहा
ये हाल था तो कोई नेक काम क्या करते !

उसे जाने की जल्दी थी सो मैं आँखों ही आँखों में
जहाँ तक छोड़ सकता था वहाँ तक छोड़ आया हूँ !

तमाम शहर की आँखों में रेज़ा रेज़ा हूँ
किसी भी आँख से उठता नहीं मुकम्मल मैं !