आपकी शायरी | Aapki Shayari

Aapki Shayari

मैं देखता हूँ आप को हद्द ए निगाह तक
लेकिन मिरी निगाह का क्या एतिबार है !

किस मुँह से फिर तू आप को कहता है इश्क़ बाज़
ऐ रू सियाह तुझ से तो ये भी न हो सका !

कल तो देखा था मुबारक बुत कदे में आप को
आज हज़रत जा के मस्जिद में मुसलमाँ हो गए !

दावा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को
तूल ए शब ए फ़िराक़ को तो नाप दीजिए !

आप को मेरे तआरुफ़ की ज़रूरत क्या है
मैं वही हूँ कि जिसे आप ने चाहा था कभी !

हम ने ब सद ख़ुलूस पुकारा है आप को
अब देखना है कितनी कशिश है ख़ुलूस में !

कलकत्ता में हर दम है मुनीर आप को वहशत
हर कोठी में हर बंगले में जंगला नज़र आया !

बे गुनह कहता फिरे है आप को
शैख़ नस्ल ए हज़रत ए आदम नहीं !

मैं भी शायद आप को तन्हा मिलों
अपनी तन्हाई में जा कर देखिए !

यूँही हर शाम अगर आप को हम याद रहें
सोहबतें गर्म रहें महफ़िलें आबाद रहें !

मैं तो अपने आप को उस दिन बहुत अच्छी लगी
वो जो थक कर देर से आया उसे कैसा लगा !

क़ुर्बान सौ तरह से किया तुझ पर आप को
तू भी कभू तो जान न आया बजाए ईद !

मुँह आप को दिखा नहीं सकता है शर्म से
इस वास्ते है पीठ इधर आफ़्ताब की !

आप को रंज हुआ आप के दुश्मन रोए
मैं पशेमान हुआ हाल सुना कर अपना !

हम ख़ुदा भी मान लेंगे आप को
आप पहले हो तो जाएँ आदमी !

हमेशा आप को समझा कि आप अपने हैं
हमेशा आप ने समझा कि दूसरे हैं हम !

हम आप को देखते थे पहले
अब आप की राह देखते हैं !

शौकत वो आज आप को पहचान तो गए
अपनी निगाह में जो कभी आसमाँ रहे !

मैं अपने आप को भी देखने से क़ासिर हूँ
ये शाम ए हिज्र मुझे क्या दिखाना चाहती है !