अजनबी शायरी – Ajnabi Shayari in Hindi

Ajnabi Shayari

अजनबी बूद ओ बाश के क़ुर्ब ओ जवार में मिला
बिछड़ा तो वो मुझे किसी और दयार में मिला !

वही दो चार चेहरे अजनबी से
उन्हीं को फिर से दोहराना पड़ेगा !

ये अजनबी सी मंज़िलें और रफ़्तगाँ की याद
तन्हाइयों का ज़हर है और हम हैं दोस्तो !

वो जिस को दूर से देखा था अजनबी की तरह
कुछ इस अदा से मिला है कि दोस्ताना लगे !

दर ओ दीवार इतने अजनबी क्यूँ लग रहे हैं
ख़ुद अपने घर में आख़िर इतना डर क्यूँ लग रहा है !

अजनबी जान के क्या नाम ओ निशाँ पूछते हो
भाई हम भी उसी बस्ती के निकाले हुए हैं !

गामज़न हैं हम मुसलसल अजनबी मंज़िल की सम्त
ज़िंदगी की आरज़ू में ज़िंदगी खोते हुए !

वो एक दिन एक अजनबी को
मिरी कहानी सुना रहा था !

ज़ेहन में अजनबी सम्तों के हैं पैकर लेकिन
दिल के आईने में सब अक्स पुराने निकले !

न अजनबी है कोई और न आश्ना कोई
अकेले पन की भी होती है इंतिहा कोई !

उस अजनबी से वास्ता ज़रूर था कोई
वो जब कभी मिला तो बस मिरा लगा मुझे !

ये हम सफ़र तो सभी अजनबी से लगते हैं
मैं जिस के साथ चला था वो क़ाफ़िला है कहाँ !

अजनबी शहरों में तुझ को ढूँढता हूँ जिस तरह
इक गली हर शहर में तेरी गली जैसी भी है !

हम अजनबी हैं आज भी अपने दयार में
हर शख़्स पूछता है यही तुम यहाँ कहाँ !

ऐसा न हो कि ताज़ा हवा अजनबी लगे
कमरे का एक आध दरीचा खुला भी रख !

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं
जो यहाँ आबाद हैं उन पर भी घर खुलता नहीं !

अजनबी ख़ुशबू की आहट से महक उट्ठा बदन
क़हक़हों के लम्स से ख़ौफ़ ए ख़िज़ाँ रौशन हुआ !

अजनबी शहर में कुछ ख़ौफ़ सा महसूस हुआ
ओढ़ ली मैं ने ख़मोशी से उतारी हुई रात !

रहगुज़र भी तिरी पहले थी अजनबी
हर गली अब तिरी रहगुज़र हो गई !

जिसे भी देखो वही अजनबी सा लगता है
तुम्हारे शहर में कोई भी आश्ना न मिला !