अली शायरी | Ali Shayari

Ali Shayari

चंदा रहे परतव से तिरे या अली रौशन
ख़ुर्शीद को है दर से तिरे शाम ओ सहर फ़ैज़ !

मूसा के सर पे पाँव है अहल ए निगाह का
उस की गली में ख़ाक उड़ी कोह ए तूर की !

आला में तो अदना के हवाले ही हवाले
अदना ही में आला का हवाला नहीं मिलता !

हम ने हर अदना को आला कर दिया
ख़ाकसारी अपनी काम आई बहुत !

मोहब्बत फ़र्क़ खो देती है आला और अदना का
रुख़ ए ख़ुर्शीद में ज़र्रे की हम तनवीर देखेंगे !

बच गया तीर ए निगाह ए यार से
वाक़ई आईना है फ़ौलाद का !

आली हो या अफ़्साना या चाहत का ताना बाना
लुत्फ़ अधूरा रह जाता है पूरी बात बता देने से !

होते ही शाम जलने लगा याद का अलाव
आँसू सुनाने दुख की कहानी निकल पड़े !

रौशन अलाव होते ही आया तरंग में
वो क़िस्सा गो ख़ुद अपने में इक दास्तान था !

सालिक चखाऊँ उन को मज़ा जौर का अभी
डरता हूँ कुछ बुरा न कहें सिन के दस मुझे !

अब तक भी मेरे होश ठिकाने नहीं हुए
सालिक का हाल रात को ऐसा सुना कि बस !

तंग दस्ती अगर न हो सालिक
तंदुरुस्ती हज़ार नेमत है !

याद करते हैं तुझे दैर ओ हरम में शब ओ रोज़
अहल ए तस्बीह जुदा साहिब ए ज़ुन्नार जुदा !

चिंगारियाँ न डाल मिरे दिल के घाव में
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ ग़मों के अलाव में !

ये नाद ए अली का अजब मोजिज़ा था
सभी तीर पलटे कमानों की जानिब !

मैं क़ाइल ए ख़ुदा ओ नबी ओ इमाम हूँ
बंदा ख़ुदा का और अली का ग़ुलाम हूँ !

सय्याद और क़ैद ए क़फ़स से करे रहा
झूटी ख़बर किसी की उड़ाई हुई सी है !

क्या सैर हो बता दे कोई बुत कदे की राह
जाता हूँ राह काबे की मैं पूछता हुआ !

क़द्रदानी की कैफ़ियत मालूम
ऐब क्या है अगर हुनर न हुआ !