अपना शायरी | Apna Shayari

Apna Shayari | अपना शायरी

Apna Shayari In Hindi | अपना शायरी हिंदी में

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Apna Shayari

आज मेरी इक गजल ने उस के होंटों को छुआ
आज पहली बार अपनी शाइ री अच्छी लगी

अपने ही पैरों से अपना आप रौंद
अपनी हस्ती को मिटा कर रक्स कर

देखते रहते हैं खुद अपना तमाशा दिन रात
हम हैं खुद अपने ही किरदार के मारे हुए लोग

अपने सिवा नहीं है कोई अपना आश्ना
दरिया की तरह आप हैं अपने कनार में

अब जहाँ में बाकी है आह से निशाँ अपना
उड़ गए धुएँ अपने रह गया धुआँ अपना

हम आप ही को अपना मक्सूद जानते हैं
अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं

कतील अपना मुकद्दर गम से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते

अपना घर फिर अपना घर है अपने घर की बात क्या
गैर के गुलशन से सौ दर्जा भला अपना कफस

जो अपने आप से बढ़ कर हमारा अपना था
उसे करीब से देखा तो दूर का निकला

खयाल अपना कमाल अपना उरूज अपना जवाल अपना
ये किन भुलैयों में डाल रखा है कैसी लीला रची हुई है

अपना आप नहीं है सब कुछ अपने आप से निकलो
बदबूएँ फैला देता है पानी का ठहराव

न बज्म अपनी न अपना साकी न शीशा अपना न जाम अपना
अगर यही है निजाम ए हस्ती तो जिंदगी को सलाम अपना

ऐ शैख अपने अपने अकीदे का फर्क है
हुरमत जो दैर की है वही खानकाह की

गुल अपने गुंचे अपने गुल्सिताँ अपना बहार अपनी
गवारा क्यूँ चमन में रह के जुल्म ए बागबाँ कर लें

जिंदगी है अपने कब्जे में न अपने बस में मौत
आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है

है दौर ए फलक जोफ में पेश ए नजर अपने
किस वक्त हम उठते हैं कि चक्कर नहीं आता

तुम्हीं कहो कि तुम्हें अपना समझ के क्या पाया
मगर यही कि जो अपने थे सब पराए हुए

जुरअत कहाँ कि अपना पता तक बता सकूँ
जीता हूँ अपने मुल्क में औरों के नाम से

कुछ छोटे छोटे दुख अपने कुछ दुख अपने अजीजों के
इन से ही जीवन बनता है सो जीवन बन जाएगा