बाहर शायरी – Bahar Shayari in Hindi

Bahar Shayari

दिल ए हर क़तरा है साज़ ए अनल बहर
हम उस के हैं हमारा पूछना क्या !

है मुश्तमिल नुमूद ए सुवर पर वजूद ए बहर
याँ क्या धरा है क़तरा ओ मौज ओ हबाब में !

ज़िद में दुनिया की बहर हाल मिला करते थे
वर्ना हम दोनों में ऐसी कोई उल्फ़त भी न थी !

जीना है तो जी लेंगे बहर तौर दिवाने
किस बात का ग़म है रसन ओ दार के होते !

तुझ को बर्बाद तो होना था बहर हाल ख़ुमार
नाज़ कर नाज़ कि उस ने तुझे बर्बाद किया !

जी में ठानी है कि जीना है बहर हाल मुझे
जिस को मरना है वो चुप चाप ही मरता जाए !

कली की ख़ू है बहर हाल मुस्कुराने की
वगर्ना रास किसे है हुआ ज़माने की !

इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता !

बे ज़बानी तर्जुमान ए शौक़ बेहद हो तो हो
वर्ना पेश ए यार काम आती है तक़रीरें कहीं !

चाँद चढ़ता देखना बेहद समुंदर पर मुनीर
देखना फिर बहर को उस की कशिश से जागता !

शौक़ ए बेहद ने किसी गाम ठहरने न दिया
वर्ना किस गाम मिरा ख़ून ए तमन्ना न हुआ !

हम बहर हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते
तुम भी इक आध घड़ी काश हमारे होते !

बाहर बाहर सन्नाटा है अंदर अंदर शोर बहुत
दिल की घनी बस्ती में यारो आन बसे हैं चोर बहुत !

दर खोल के देखूँ ज़रा इदराक से बाहर
ये शोर सा कैसा है मिरी ख़ाक से बाहर !

हुदूद ए शहर से बाहर भी बस्तियाँ फैलीं
सिमट के रह गए यूँ जंगलों के घेरे भी !

बुरा भला वास्ता बहर तौर उस से कुछ देर तो रहा है
कहीं सर ए राह सामना हो तो इतनी शिद्दत से मुँह न मोड़ूँ !

ख़ामोश खड़ा हूँ मैं दर ए ख़्वाब से बाहर
क्या जानिए कब तक इसी हालत में रहूँगा !

हुदूद ए वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ
मैं एक लम्हा हूँ सदियों के इंतिज़ार में हूँ !

अगर चिलमन के बाहर वो बुत ए काफ़िर अदा निकले
ज़बान ए शैख़ से सल्ले अला सल्ले अला निकले !

जो दिल में है वही बाहर दिखाई देता है
अब आर पार ये पत्थर दिखाई देता है !