Bulandi Shayari दुलंदी शायरी हिंदी में (2022-23)

Bulandi Shayari In Hindi | बुलंदी शायरी हिंदी में

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Bulandi Shayari दुलंदी शायरी हिंदी में (2022-23) In Hindi

Bulandi Shayari
वही पस्ती ओ बुलंदी है जमीं की आतिश
वही गर्दिश में शब ओ रोज हैं अफ्लाक हनूज

अपनी किस्मत का बुलंदी पे सितारा देखूँ
जुल्मत ए शब में यही एक नजारा देखूँ

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

Bulandi Shayari दुलंदी शायरी हिंदी में (2022-23) हिंदी में

फिर तुम्हारे पाँव छूने खुद बुलंदी आएगी
सब दिलों पर राज कर के ताज दारी सीख लो

Bulandi Shayari दुलंदी शायरी हिंदी में (2022-23) 2 line

मैं एक जर्रा बुलंदी को छूने निकला था
हवा ने थम के जमीं पर गिरा दिया मुझ को

तुम आसमाँ की बुलंदी से जल्द लौट आना
हमें जमीं के मसाइल पे बात करनी है

इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया
हम को पर्वाज का मौका ही हवा ने न दिया

खौफ इक बुलंदी से पस्तियों में रुलने का
आब जू में रहता है और नजर नहीं आता

आजिजी कहने लगी गर हो बुलंदी की तलब
दिल झुका दाइरा ए ना रा ए तकबीर में आ

मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ़ के क्या देखूँ
उरूज ए फन मिरी दहलीज पर उतार मुझे

पस्ती ने बुलंदी को बनाया है हकीकत
ये रिफअत ए अफ्लाक भी मुहताज ए जमीं है

बुलंदी के लिए बस अपनी ही नजरों से गिरना था
हमारी कम नसीबी हम में कुछ गैरत जियादा थी

कौन कहता है बुलंदी पे नहीं हूँ सागर
मेरी मेराज ए मोहब्बत मिरी रुस्वाई है

सर बुलंदी को यहाँ दिल ने न चाहा मुनइम
वर्ना ये खेमा ए अफ्लाक पुराना क्या था

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है जमीं से ही नजर आता है

जब बुलंदी पर पहुँच जाते हैं लोग
किस कदर छोटे नजर आते हैं लोग

तुम उस को बुलंदी से गिराने में लगे हो
तुम उस को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते

आता है यहाँ सब को बुलंदी से गिराना
वो लोग कहाँ हैं कि जो गिरतों को उठाएँ

बस कि है पेश ए नजर पस्त ओ बुलंद ए आलम
ठोकरें खा के मिरी आँखों में ख्वाब आता है

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