बुरा शायरी | Bura Shayari

Bura Shayari

जितने अच्छे हैं मैं हूँ उन में बुरा
हैं बुरे जितने उन में अच्छा हूँ !

बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है
हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है !

वाए क़िस्मत वो भी कहते हैं बुरा
हम बुरे सब से हुए जिन के लिए !

मोहसिन बुरे दिनों में नया दोस्त कौन हो
है जिस का पहला क़र्ज़ उसी से सवाल कर !

ज़माना है बुरे हम साए जैसा
सो हम साए से झगड़ा कर चुके हैं !

बुरे भले में फ़र्क़ है ये जानते हैं सब मगर
है कौन नेक कौन बद नज़र नज़र की बात है !

एहसान अपना कोई बुरे वक़्त का नहीं
अहबाब बेवफ़ा हैं ख़ुदा बे नियाज़ है !

अच्छे बुरे को वो अभी पहचानते नहीं
कमसिन हैं भोले भाले हैं कुछ जानते नहीं !

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे !

मेरे माहौल में हर सम्त बुरे लोग नहीं
कुछ भले भी मिरे हमराह चले आते हैं !

बुरा लगा मिरे साक़ी को ज़िक्र ए तिश्ना लबी
कि ये सवाल मिरी बज़्म में कहाँ से उठा !

क्यूँ ओ शायरी को बुरा जानूँ मुसहफ़ी
जिस शायरी ने आरिफ़ ए कामिल किया मुझे !

हमें बुरा नहीं लगता सफ़ेद काग़ज़ भी
ये तितलियाँ तो तुम्हारे लिए बनाते हैं !

बुरा हो उल्फ़त ए ख़ूबाँ का हम नशीं हम तो
शबाब ही में बुरा अपना हाल कर बैठे !

किस क़दर नादिम हुआ हूँ मैं बुरा कह कर उसे
क्या ख़बर थी जाते जाते वो दुआ दे जाएगा !

बुरा न मान ज़िया उस की साफ़ गोई का
जो दर्द मंद भी है और बे अदब भी नहीं !

तू ने कब इश्क़ में अच्छा बुरा सोचा सरवर
कैसे मुमकिन है कि तेरा बुरा अंजाम न हो !

बुरा सही मैं प नीयत बुरी नहीं मेरी
मिरे गुनाह भी कार ए सवाब में लिखना !

शग़्ल ए उल्फ़त को जो अहबाब बुरा कहते हैं
कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या कहते हैं !

बुरा क्या है बाँधो अगर तेग़ ओ ख़ंजर
मगर पहले अपनी कमर देख लेना !