Dhoop Shayari | धूप शायरी 532+

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Dhoop Shayari

वो गरीबों की तकलीफ को समझ नहीं सकते,
जो गर्मी की धूप में दो-चार कदम भी चल नहीं सकते.

 

कभी धूप तो कभी बारिश से परेशान है,
फिर भी हमेशा फायदें में रहता इंसान है.

 

जिन्दगी में छाँव है तो कभी धूप है,
ऐ जिन्दगी न जाने तेरे कितने रूप है.

 

मुझको छाँव में रखा खुद जलता रहा धूप में,
मैंने देखा है एक फ़रिश्ता पिता के रूप में.

 

कड़ी धूप में मैं अपने बदल को जला रहा हूँ,
तकलीफ़ बहुत है मगर मैं घर चला रहा हूँ.

 

धूप का सफर था और पैरों में थकान,
मैं कैसे रूकता क्योंकि बाकी था मेरा उड़ान.