फुर्सत शायरी | Fursat Shayari

Fursat Shayari

फ़ुर्सत में रहा करते हैं फ़ुर्सत से ज़्यादा
मसरूफ़ हैं हम लोग ज़रूरत से ज़्यादा !

अक़्ल को तन्क़ीद से फ़ुर्सत नहीं
इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख !

किसे फ़ुर्सत कि फ़र्ज़ ए ख़िदमत ए उल्फ़त बजा लाए
न तुम बेकार बैठे हो न हम बेकार बैठे हैं !

ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की
जब होता है कोई हमदम होता है !

वाइज़ को लअन तअन की फ़ुर्सत है किस तरह
पूरी अभी ख़ुदा की तरफ़ लौ लगी नहीं !

वक़्त फ़ुर्सत दे तो मिल बैठें कहीं बाहम दो दम
एक मुद्दत से दिलों में हसरत ए तरफ़ैन है !

ग़म ए हयात ने फ़ुर्सत न दी सुनाने की
चले थे हम भी मोहब्बत की दास्ताँ ले कर !

जब भी फ़ुर्सत मिली हंगामा ए दुनिया से मुझे
मेरी तन्हाई को बस तेरा पता याद आया !

हर वक़्त की आह ओ ज़ारी से दम भर तो ज़रा मिलती फ़ुर्सत
रोना ही मुक़द्दर था मेरा तो किस लिए मैं शबनम न हुआ !

दिखा दूँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज़माने ने
तमाशाए ए फ़रावाँ को फ़रावाँ कर के छोड़ूँगा !

मिल नहीं पाती ख़ुद अपने आप से फ़ुर्सत मुझे
मुझ से भी महरूम रहती है कभी महफ़िल मिरी !

कहाँ किसी को थी फ़ुर्सत फ़ुज़ूल बातों की
तमाम रात वहाँ ज़िक्र बस तुम्हारा था !

नहीं है फ़ुर्सत यहीं के झगड़ों से फ़िक्र ए उक़्बा कहाँ की वाइज़
अज़ाब ए दुनिया है हम को क्या कम सवाब हम ले के क्या करेंगे !

हाल ए दिल कौन सुनाए उसे फ़ुर्सत किस को
सब को इस आँख ने बातों में लगा रक्खा है !

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली
चलो बस हो चुका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली !

फ़ुर्सत में इक नफ़स के क्या दर्द ए दिल सुनोगे
आए तो तुम व लेकिन वक़्त ए अख़ीर आए !

पुर्सिश ए हाल की फ़ुर्सत तुम्हें मुमकिन है न हो
पुर्सिश ए हाल तबीअत को गवारा भी नहीं !

फ़ुर्सत हो तो ये जिस्म भी मिट्टी में दबा दो
लो फिर मैं ज़माँ और मकाँ से निकल आया !

नज़्ज़ारा ए जमाल की फ़ुर्सत कहाँ मिली
पहली नज़र नज़र की हदों से गुज़र गई !

ग़म ए हयात से इतनी भी है कहाँ फ़ुर्सत
कि तेरी याद में जी भर के रो लिया जाए !