गर्मी शायरी | Garmi Shayari

Garmi Shayari | गर्मी शायरी

Garmi Shayari In Hindi | गर्मी शायरी हिंदी में

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Garmi Shayari

आतिश ए दोजख में ये गर्मी कहाँ
सोज ए गम हा ए निहानी और है

कयामत में बड़ी गर्मी पड़ेगी हजरत ए जाहिद
यहीं से बादा ए गुल रंग में दामन को तर कर लो

गर्मी से मुज्तरिब था जमाना जमीन पर
भुन जाता था जो गिरता था दाना जमीन पर

गर्मी में तेरे कूचा नशीनों के वास्ते
पंखे हैं कुदसियों के परों के बहिश्त में

सर्दी और गर्मी के उज्र नहीं चलते
मौसम देख के साहब इश्क नहीं होता

गर्मी सी ये गर्मी है
माँग रहे हैं लोग पनाह

लगी रहती है अश्कों की झड़ी गर्मी हो सर्दी हो
नहीं रुकती कभी बरसात जब से तुम नहीं आए

पिघलते देख के सूरज की गर्मी
अभी मासूम किरनें रो गई हैं

धूप की गरमी से ईंटें पक गईं फल पक गए
इक हमारा जिस्म था अख्तर जो कच्चा रह गया

गर उस के ओर कोई गर्मी से देखता है
इक आग लग उठे है अपने तो तन बदन में

सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे
ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो

गर्मी लगी तो खुद से अलग हो के सो गए
सर्दी लगी तो खुद को दोबारा पहन लिया

प्यासा मत जला साकी मुझे गर्मी सीं हिज्राँ की
शिताबी ला शराब ए खाम हम ने दिल को भूना है

तू जून की गर्मी से न घबरा कि जहाँ में
ये लू तो हमेशा न रही है न रहेगी

गर्मी बहुत है आज खुला रख मकान को
उस की गली से रात को पुर्वाई आएगी

क्यूँ तिरी थोड़ी सी गर्मी सीं पिघल जावे है जाँ
क्या तू नें समझा है आशिक इस कदर है मोम का

गर्मी ने कुछ आग और भी सीने में लगाई
हर तौर गरज आप से मिलना ही कम अच्छा

गर्म ए सफर है गर्म ए सफर रह मुड़ मुड़ कर मत पीछे देख
एक दो मंजिल साथ चलेगी पटके हुए कदमों की चाप

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