घर शायरी | Ghar Shayari

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थक चूका हूँ मेहमान की तरह घर आते-आते,
बेघर हो गये है हम चंद रूपये कमाते-कमाते.

 

उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

 

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते

 

पता अब तक नहीं बदला हमारा
वही घर है वही क़िस्सा हमारा

 

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ
घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना

 

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

 

मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं
मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ

 

गलतियाँ करने से मैं अब घबराने लगा हूँ,
जिम्मेदारियाँ घर की मैं जब से उठाने लगा हूँ.

 

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंजिल,
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा.

 

दूर है मस्जिद क्या चला जाएँ,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसा दिया जाएँ.

 

तोड़ दिए मैंने घर के आईने सभी,
प्यार में हारे हुए लोग मुझसे देखे नहीं जाते.

 

कभी दिमाग कभी दिल कभी नजर में रहो,
ये सब तुम्हारे ही घर है, किसी भी घर में रहो.

 

आज फिर घर में कैद हर हस्ती हो गई,
जिन्दगी महँगी और दौलत सस्ती हो गई.

 

आईना देख कर तसल्ली हुई,
हमको इस घर में जानता है कोई.