गुलाबी शायरी | Gulabi Shayari

Gulabi Shayari | गुलाबी शायरी

Gulabi Shayari In Hindi | गुलाबी शायरी हिंदी में

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Gulabi Shayari
वो गुलाबी बादलों में एक नीली झील सी
होश काएम कैसे रहते था ही कुछ ऐसा लिबास

नींद का हल्का गुलाबी सा खुमार आँखों में था
यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं

वुजू होता है याँ तो शैख उसी आब ए गुलाबी से
तयम्मुम के लिए तुम खाक जा कर दश्त में फाँको

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जान ए मन त्यौहार होली में

गुलाबी पाँव मिरे चम्पई बनाने को
किसी ने सहन में मेहंदी की बाड़ उगाई हो

कहाँ मिलेगी मिसाल मेरी सितमगरी की
कि मैं गुलाबों के जख्म काँटों से सी रहा हूँ

सभी रिश्ते गुलाबों की तरह खुशबू नहीं देते
कुछ ऐसे भी तो होते हैं जो काँटे छोड़ जाते हैं

तेरी खुशबू से मोअत्तर है जमाना सारा
कैसे मुमकिन है वो खुशबू भी गुलाबों में मिले

वो महकता है जो खुश्बू के हवालों की तरह
इस को रक्खा है किताबों में गुलाबों की तरह

है लुत्फ हसीनों की दो रंगी का अमानत
दो चार गुलाबी हों तो दो चार बसंती

मेरे होंटों पे खामुशी है बहुत
इन गुलाबों पे तितलियाँ रख दे

गुलाबों के होंटों पे लब रख रहा हूँ
उसे देर तक सोचना चाहता हूँ

बसी है सूखे गुलाबों की बात साँसों में
कोई खयाल किसी याद के हिसार में है

वो शख्स अमर है, जो पीवेगा दो चाँदों के नूर
उस की आँखें सदा गुलाबी जो देखे इक लाल

वो जख्म चुन के मिरे खार मुझ में छोड़ गया
कि उस को शौक था बे इंतिहा गुलाबों का

न मिरे जख्म खिले हैं न तिरा रंग ए हिना
मौसम आए ही नहीं अब के गुलाबों वाले

मैं ने भेजी थी गुलाबों की बशारत उस को
तोहफतन उस ने भी खुशबू ए वफा भेजी है

गैर मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
मेरे रिसते हुए जख्मों के हिसाबों की तरह

रंग ए बदन से उस के ये होता जल्वा गर
एक तह गुलाबी दी हुई है पैरहन के बीच

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