हक शायरी | Hak Shayari

Hak Shayari | हक शायरी

Hak Shayari In Hindi | हक शायरी हिंदी में

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Hak Shayari
हक में उश्शाक के कयामत है
क्या करम क्या इताब क्या दुश्नाम

अर्शिया हक के परस्तारों में हो
तुम भी काफिर हो गुनहगारों में हो

बला की हुस्न वर है अर्शिया हक
हसद रखती हैं सब जन्नत की हूरें

हक अदा करना मोहब्बत का बहुत दुश्वार है
हाल बुलबुल का सुना देखा है परवाने को हम

ब जुज हक के नहीं है गैर से हरगिज तवक्को कुछ
मगर दुनिया के लोगों में मुझे है प्यार से मतलब

आजादियों का हक न अदा हम से हो सका
अंजाम ये हुआ कि गिरफ्तार हो गए

दवाम पाएगा इक रोज हक जमाने में
ये इंतिजार नहीं इंतिजार ए वहशत है

जाहिद उमीद ए रहमत ए हक और हज्व ए मय
पहले शराब पी के गुनाह गार भी तो हो

हक ने तुझ को इक जबाँ दी और दिए हैं कान दो
इस के ये मअ नी कहे इक और सुने इंसान दो

याद तो हक की तुझे याद है पर याद रहे
यार दुश्वार है वो याद जो है याद का हक

मैं दे रहा हूँ तुझे खुद से इख्तिलाफ का हक
ये इख्तिलाफ का हक है मुखालिफत का नहीं

मुझ को भी हक है जिंदगानी का
मैं भी किरदार हूँ कहानी का

जिंदा रहने का हक मिलेगा उसे
जिस में मरने का हौसला होगा

हक मुझे बातिल आश्ना न करे
मैं बुतों से फिरूँ खुदा न करे

हक से मिलना गेरवे कपड़ों उपर मौकूफ नईं
दिल के तईं रंगो फकीरी ये है और सब है लिबास

देखने वाले जमाने का भी हक है मुझ पर
सब की नजरों से छुपा कर मिरी तस्वीर न देख

जमाना तुझ को हरीफ कह ले उसे ये हक है
मिरी नजर में तू देवता है यही बहुत है

ऐ अजल कुछ जिंदगी का हक भी है
जिंदगी तेरी अमानत ही सही

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