इल्जाम शायरी | Ilzam Shayari

Ilzam Shayari | इल्जाम शायरी

इल्जाम शायरी | Ilzam Shayari In Hindi

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Ilzam Shayari
गलत है जज्बा ए दिल पर नहीं कोई इल्जाम
खुशी मिली न हमें जब तो गम की खू कर ली

अबस इल्जाम मत दो मुश्किलात ए राह को राही
तुम्हारे ही इरादे में कमी मालूम होती है

अपनी लग्जिश को तो इल्जाम न देगा कोई
लोग थक हार के मुजरिम हमें ठहराएँगे

कोई इल्जाम कोई तंज कोई रुस्वाई
दिन बहुत हो गए यारों ने इनायत नहीं की

शम्अ पर खून का इल्जाम हो साबित क्यूँ कर
फूँक दी लाश भी कम्बख्त ने परवाने की

खुद अपने कत्ल का इल्जाम ढो रहा हूँ अभी
मैं अपनी लाश पे सर रख के रो रहा हूँ अभी

बुतों को पूजने वालों को क्यूँ इल्जाम देते हो
डरो उस से कि जिस ने उन को इस काबिल बनाया है

दिल पे आए हुए इल्जाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं

छोड़ना है तो न इल्जाम लगा कर छोड़ो
कहीं मिल जाओ तो फिर लुत्फ ए मुलाकात रहे

तुम मेरे लिए अब कोई इल्जाम न ढूँडो
चाहा था तुम्हें इक यही इल्जाम बहुत है

कितने इल्जाम आखिर अपने सर
तुम ने गैरों को सर चढ़ा के लिए

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यार पर इल्जाम कैसा ऐ दिल ए खाना खराब
जो किया तुझ से तिरी किस्मत ने उस ने क्या किया

तुम पे इल्जाम न आ जाए सफर में कोई
रास्ता कितना ही दुश्वार हो ठहरा न करो

दस्तूर ही अलग है तिरी बज्म ए नाज का
इल्जाम दे के कह दिया इल्जाम ही तो है

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