इंसानियत शायरी | Insaaniyat Shayari

Insaaniyat Shayari | इंसानियत शायरी

Insaaniyat Shayari In Hindi | इंसानियत शायरी हिंदी में

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Insaaniyat Shayari
धज्जियाँ उड़ने लगीं इंसानियत की चार सू
दिल दरिंदा हो गया इंसान पथरीले हुए

जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों जब्ह होती हो
जहाँ तजलील है जीना वहाँ बेहतर है मर जाना

जहान ए दर्द में इंसानियत के नाते से
कोई बयान करे मेरी दास्ताँ होगी

जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम

नहीं है इंसानियत के बारे में आज भी जेहन साफ जिन का
वो कह रहे हैं कि जिस से नेकी करोगे उस से बदी मिलेगी

जिस में इंसानियत नहीं रहती
हम दरिंदे हैं ऐसे जंगल के

मौत के खूँ ख्वार पंजों में सिसकती है हयात
आज है इंसानियत की हर अदा सहमी हुई

हिन्दू से पूछिए न मुसलमाँ से पूछिए
इंसानियत का गम किसी इंसाँ से पूछिए

कभी मंदिर कभी मस्जिद पे है इस का बसेरा
धरम इंसानियत का बस कबूतर जानता है

दावा ए इंसानियत माइल अभी जेबा नहीं
पहले ये सोचो किसी के काम आ सकता हूँ मैं

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