जन्म शायरी | Janam Shayari

Janam Shayari

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया !

ख़िज़ाँ की रुत है जनम दिन है और धुआँ और फूल
हवा बिखेर गई मोम बत्तियाँ और फूल !

घिरा हुआ हूँ जनम दिन से इस तआक़ुब में
ज़मीन आगे है और आसमाँ मिरे पीछे !

किसी जनम में जो मेरा निशाँ मिला था उसे
पता नहीं कि वो कब उस निशान तक पहुँचा !

उसे खिलौनों से बढ़ कर है फ़िक्र रोटी की
हमारे दौर का बच्चा जनम से बूढ़ा है !

फ़ासले ऐसे कि इक उम्र में तय हो न सकें
क़ुर्बतें ऐसी कि ख़ुद मुझ में जनम है उस का !

मैं तकिए पर सितारे बो रहा हूँ
जनम दिन है अकेला रो रहा हूँ !

मैं ने जो कहा मुझ पे क्या क्या न सितम गुज़रा
बोला कि अबे तेरा रोते ही जनम गुज़रा !

माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
आज अपने साथ अपना जनम दिन मनाया है !

कोई तख़्लीक़ हो ख़ून ए जिगर से जन्म लेती है
कहानी लिख नहीं सकते कहानी माँगने वाले !

मैं किसी जन्म की यादों पे पड़ा पर्दा हूँ
कोई इक लम्हे को इक दम से उठाता है मुझे !

जाने क्या सोच के हम तुझ से वफ़ा करते हैं
क़र्ज़ है पिछले जन्म का सो अदा करते हैं !

तुम को भी पहचान नहीं है शायद मेरी उलझन की
लेकिन हम मिलते रहते तो अच्छा ही रहता जानम !

मैं कहूँ किस तरह ये बात उस से
तुझ को जानम मुझी से ख़तरा है !