झलक शायरी | Jhalak Shayari

Jhalak Shayari

क़बा ए लाला ओ गुल में झलक रही थी ख़िज़ाँ
भरी बहार में रोया किए बहार को हम !

झलक थी या कोई ख़ुशबू ए ख़द्द ओ ख़ाल थी वो
चली गई तो मिरे आस पास रहने लगी !

ऐ जल्वा ए जानाना फिर ऐसी झलक दिखला
हसरत भी रहे बाक़ी अरमाँ भी निकल जाए !

कोई आया तिरी झलक देखी
कोई बोला सुनी तिरी आवाज़ !

पहलू में कभी ग़म के ख़ुशियों की झलक देखी
हँसती सी कभी सूरत दिल गीर नज़र आई !

आए अदम से एक झलक देखने तिरी
रक्खा ही क्या था वर्ना जहान ए ख़राब में !

अब भी कुछ दिल में रऊनत की झलक बाक़ी है
या ख़ुदा फिर किसी बद ख़ू से मोहब्बत हो जाए !

ग़श खा के गिरा पहले ही शोले की झलक से
मूसा को भला कहिए तो क्या तूर की सूझी !

जब भी हुजूम ए ग़म में ख़ुशी की झलक मिली
जुगनू की रौशनी में अंधेरे नहाए हैं !

दिखाई ख़्वाब में दी थी टुक इक मुँह की झलक हम कूँ
नहीं ताक़त अँखियों के खोलने की अब तलक हम कूँ !

जब से तेरी नज़र पड़ी है झलक
तब से लगती नहीं पलक से पलक !

वो जिन आँखों में थी बरसात के मंज़र की झलक
अब उन आँखों में सफ़ेदी न सियाही न धनक !

बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा
आँख से हो कर गाल भिगो कर मिट्टी में मिल जाएगा !

कहते हैं जिस को जन्नत वो इक झलक है तेरी
सब वाइज़ों की बाक़ी रंगीं बयानियाँ हैं !

हर लफ़्ज़ ए आरज़ू में झलक उन की आ गई
उन को निकालता ही रहा दास्ताँ से मैं !

लिबास में है वो तर्ज़ ए तपाक ए आराइश
जो अंग चाहे छुपाना झलक झलक जाए !

ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ !

परी थी कोई छलावा थी या जवानी थी
कहाँ ये हो गई चम्पत झलक दिखा के मुझे !

शर्मा के बिगड़ के मुस्कुरा कर
वो छुप रहे इक झलक दिखा कर !

जाते मौसम ने जिन्हें छोड़ दिया है तन्हा
मुझ में उन टूटते पत्तों की झलक है कितनी !