कदर शायरी | Kadar Shayari

Kadar Shayari

जिस क़दर वो मुझ से बिगड़ा मैं भी बिगड़ा उस क़दर
वो हुआ जामे से बाहर मैं भी नंगा हो गया !

बढ़ा हंगामा ए शौक़ इस क़दर बज़्म ए हरीफ़ाँ में
कि रुख़्सत हो गया उस का हिजाब आहिस्ता आहिस्ता !

किस क़दर मोतक़िद ए हुस्न ए मुकाफ़ात हूँ मैं
दिल में ख़ुश होता हूँ जब रंज सिवा होता है !

आगही दाम ए शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम ए तक़रीर का !

ख़ुश अर्ज़ानी हुई है इस क़दर बाज़ार ए हस्ती में
गिराँ जिस को समझता हूँ वो कम क़ीमत निकलता है !

यारो शब ए फ़िराक़ मैं रोया हूँ इस क़दर
था चौथे आसमान पे पानी कमर कमर !

कुछ इस क़दर नहीं सफ़र ए हस्ती ओ अदम
गर पाँव उठाइए तो ये अर्सा है दो क़दम !

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की !

किस क़दर दिल से फ़रामोश किया आशिक़ को
न कभी आप को भूले से भी मैं याद आया !

शहर में जुर्म ओ हवादिस इस क़दर हैं आज कल
अब तो घर में बैठ कर भी लोग घबराने लगे !

उमीद ए वस्ल ने धोके दिए हैं इस क़दर हसरत
कि उस काफ़िर की हाँ भी अब नहीं मालूम होती है !

सताइश गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़ ए रिज़वाँ का
वो इक गुल दस्ता है हम बे ख़ुदों के ताक़ ए निस्याँ का !

इस क़दर ऊँची हुई दीवार ए नफ़रत हर तरफ़
आज हर इंसाँ से इंसाँ की पज़ीराई गई !

जिस क़दर हम से तुम हुए नज़दीक
उस क़दर दूर कर दिया हम को !

ज़िंदगी इस क़दर कठिन क्यूँ है
आदमी की भला ख़ता क्या है !

पी जिस क़दर मिले शब ए महताब में शराब
इस बलग़मी मिज़ाज को गर्मी ही रास है !

शोर रखते हैं जहाँ में जिस क़दर सब्ज़ान ए हिंद
बे नमक है उन के आगे हुस्न और अतराफ़ का !

किस क़दर बद नामियाँ हैं मेरे साथ
क्या बताऊँ किस क़दर तन्हा हूँ मैं !

ना उमीदी बढ़ गई है इस क़दर
आरज़ू की आरज़ू होने लगी !