किताब शायरी | Kitab Shayari

Kitab Shayari | किताब शायरी

Kitab Shayari In Hindi | किताब शायरी हिंदी में

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Kitab Shayari
ये जो जिंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है
कहीं इक हसीन सा ख्वाब है कहीं जान लेवा अजाब है

किताब ए हुस्न है तू मिल खुली किताब की तरह
यही किताब तो मर मर के मैं ने अजबर की

मैं उस के बदन की मुकद्दस किताब
निहायत अकीदत से पढ़ता रहा

किताब जीस्त में बाब ए अलम भी हो महफूज
सियाह रात का मंजर सहर में रक्खा जाए

मैं तो था मौजूद किताब के लफ्जों में
वो ही शायद मुझ को पढ़ना भूल गया

खुली किताब थी फूलों भरी जमीं मेरी
किताब मेरी थी रंग ए किताब उस का था

गए जमानों की दर्द कजलाई भूली बिसरी किताब पढ़ कर
जो हो सके तुम से आने वाले दिनों के रंगीन ख्वाब लिखना

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े लिखे मशहूर हो गया

खत हो कोई किताब हो या दिल का जख्म हो
जो भी है मेरे पास निशानी उसी की है

वो गजल की किताब है प्यारे
उस को पढ़ना सवाब है प्यारे

चेहरा खुली किताब है उनवान जो भी दो
जिस रुख से भी पढ़ोगे मुझे जान जाओगे

हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने

रख दी है उस ने खोल के खुद जिस्म की किताब
सादा वरक पे ले कोई मंजर उतार दे

कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब
अब तो चेहरे को ही अखबार किया जाना है

कोई भी शक्ल मुकम्मल किताब बन न सकी
हर एक चेहरा यहाँ इक्तिबास जैसा है

तुझे किताब से मुमकिन नहीं फराग कि तू
किताब ख्वाँ है मगर साहिब ए किताब नहीं

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख्वाब तो अच्छा हो

कभी आँखें किताब में गुम हैं
कभी गुम हैं किताब आँखों में

किताब खोल के देखूँ तो आँख रोती है
वरक वरक तिरा चेहरा दिखाई देता है

एक चराग और एक किताब और एक उम्मीद असासा
उस के बा द तो जो कुछ है वो सब अफ्साना है

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