Majboori Shayari मजबूरी शायरी हिंदी में (2022-23)

Majboori Shayari In Hindi | मजबूरी शायरी हिंदी में

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Majboori Shayari
जिस्म ए आजादी में फूंकी तू ने मजबूरी की रूह
खैर जो चाहा किया अब ये बता हम क्या करें

ये मरना जीना भी शायद मजबूरी की दो लहरें हैं
कुछ सोच के मरना चाहा था कुछ सोच के जीना चाहा है

बोझ उठाना शौक कहाँ है मजबूरी का सौदा है
रहते रहते स्टेशन पर लोग कुली हो जाते हैं

अपनी मजबूरी को हम दीवार ओ दर कहने लगे
कैद का सामाँ किया और उस को घर कहने लगे

इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी
कि हम ने आह तो की उन से आह भी न हुई

इश्क में ये मजबूरी तो हो जाती है
दुनिया गैर जरूरी तो हो जाती है

वो मजबूरी मौत है जिस में कासे को बुनियाद मिले
प्यास की शिद्दत जब बढ़ती है डर लगता है पानी से

थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ
मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ

हाए सीमाब उस की मजबूरी
जिस ने की हो शबाब में तौबा

दिल से बाहर निकल आना मिरी मजबूरी है
मैं तो इस शोर ए कयामत में नहीं रह सकता

लम्हा मुंसिफ भी है मुजरिम भी है मजबूरी का
फाएदा शक का मुझे दे के बरी कर जाए

इतना तो समझते थे हम भी उस की मजबूरी
इंतिजार था लेकिन दर खुला नहीं रक्खा

ये दुनिया अकबर जुल्मों की हम मजबूरी की अनारकली
हम दीवारों के बीच में हैं हम नरगा ए जब्र ओ जलाल में हैं

या हुस्न हुआ मजबूर ए करम या इश्क ने मंजिल पाली है
वो जुल्फ बिखेरे आए हैं इक वहशी के समझाने को

उस ने मजबूर ए वफा जान के मुँह फेर लिया
मुझ से ये भूल हुई पूछ लिया कैसे हो

बर्क को अब्र के दामन में छुपा देखा है
हम ने उस शोख को मजबूर ए हया देखा है

महँगाई में हर इक शय के दाम हुए हैं दूने
मजबूरी में बिके जवानी दो कौड़ी के मोल

हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है
वज्ह कोई मजबूरी भी हो सकती है

चलो हम भी वफा से बाज आए
मोहब्बत कोई मजबूरी नहीं है