Majdur Shayari मजदूर शायरी हिंदी में (2022-23)

Majdur Shayari In Hindi | मजदुर शायरी हिंदी में

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Majdur Shayari
शहर में मजदूर जैसा दर ब दर कोई नहीं
जिस ने सब के घर बनाए उस का घर कोई नहीं

सरों पे ओढ़ के मजदूर धूप की चादर
खुद अपने सर पे उसे साएबाँ समझने लगे

हम हैं मजदूर हमें कौन सहारा देगा
हम तो मिट कर भी सहारा नहीं माँगा करते

ये परिंदे भी खेतों के मजदूर हैं
लौट के अपने घर शाम तक जाएँगे

जमाम ए कार अगर मजदूर के हाथों में हो फिर क्या
तरीक ए कोहकन में भी वही हीले हैं परवेजी

ले के तेशा उठा है फिर मजदूर
ढल रहे हैं जबल मशीनों में

खून मजदूर का मिलता जो न तामीरों में
न हवेली न महल और न कोई घर होता

वही उठाए मुझे जो बने मिरा मजदूर
तुम्हारे कूचे में बैठा हूँ मैं मकाँ की तरह

फूटने वाली है मजदूर के माथे से किरन
सुर्ख परचम उफुक ए सुब्ह पे लहराते हैं

मैं इक मजदूर हूँ रोटी की खातिर बोझ उठाता हूँ
मिरी किस्मत है बार ए हुक्मरानी पुश्त पर रखना

होने दो चरागाँ महलों में क्या हम को अगर दीवाली है
मजदूर हैं हम मजदूर हैं हम मजदूर की दुनिया काली है

तामीर ओ तरक्की वाले हैं कहिए भी तो उन को क्या कहिए
जो शीश महल में बैठे हुए मजदूर की बातें करते हैं

कुचल कुचल के न फुटपाथ को चलो इतना
यहाँ पे रात को मजदूर ख्वाब देखते हैं

तेरी ताबिश से रौशन हैं गुल भी और वीराने भी
क्या तू भी इस हँसती गाती दुनिया का मजदूर है चाँद?

जान हम कार ए मोहब्बत का सिला चाहते थे
दिल ए सादा कोई मजदूर है उजरत कैसी

सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछा कर
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

हुस्न की शर्त ए वफा जो ठहरी तेशा ओ संग ए गिराँ की बात
हम हों या फरहाद हो आखिर आशिक तो मजदूर रहा

पेड़ के नीचे जरा सी छाँव जो उस को मिली
सो गया मजदूर तन पर बोरिया ओढ़े हुए

इस लिए सब से अलग है मिरी खुशबू आमी
मुश्क ए मजदूर पसीने में लिए फिरता हूँ

आने वाले जाने वाले हर जमाने के लिए
आदमी मजदूर है राहें बनाने के लिए

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