मानना शायरी | Manana Shayari

Manana Shayari | मानना शायरी

Manana Shayari In Hindi | मनाना शायरी हिंदी में

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Manana Shayari
बर्बादियों का सोग मनाना फुजूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया

मनाना ही जरूरी है तो फिर तुम
हमें सब से खफा हो कर मना लो

मैं आज सोग मनाना सिखाने वाला हूँ
इधर को आएँ जिन्हें महव ए यास होना है

रूठा यार मनाना है
कोई स्वाँग रचाओ अब

किसी की याद मनाने में ईद गुजरेगी
सो शहर ए दिल में बहुत दूर तक उदासी है

रूठने और मनाने के एहसास में है इक कैफ ओ सुरूर
मैं ने हमेशा उसे मनाया वो भी मुझे मनाए तो

रूठे लोगों को मनाने में मजा आता है
जान कर आप को नाराज किया है मैं ने

अब के रूठे तो मनाने नहीं आया कोई
बात बढ़ जाए तो हो जाती है कम आप ही आप

वो आप से रूठा नहीं मनने का नजीर आह
क्या देखे है चल पाँव पड़ और उस को मना ला

तुम्हें मनाने का मुझ को खयाल क्या आए
कि अपने आप से रूठा हुआ तो मैं भी हूँ

हमारे बीच में इक और शख्स होना था
जो लड़ पड़े तो कोई भी नहीं मनाने का

फैलती जा रही है ये दुनिया
जश्न ए आवारगी मनाने में

इश्क की सफ मनीं नमाजी सब
आबरू को इमाम करते हैं

चाह का दावा सब करते हैं मानें क्यूँकर बे आसार
अश्क की सुर्खी मुँह की जर्दी इश्क की कुछ तो अलामत हो

इक लहू की बूँद थी लेकिन कई आँखों में थी
एक हर्फ ए मो तबर था और कई मानों में था

हकीकत है इसे मानें न मानें घटती बढ़ती हैं
वो झूटी हों कि सच्ची दास्तानें घटती बढ़ती हैं

मंगल को बजरंग बली से तेरा शुक्र मनाऊँ
और शुक्र को तू अल्लाह से मेरा मंगल माँगे

शाम होती है तो लगता है कोई रूठ गया
और शब उस को मनाने में गुजर जाती है

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