Mirza Ghalib Shayari | 462+ मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी

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 Mirza Ghalib Shayari

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब यह ख्याल अच्छा है

 

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ

 

ज़िन्दगी से हम अपनी कुछ उधार नही लेते
कफ़न भी लेते है तो अपनी ज़िन्दगी देकर।

 

है एक तीर जिस में दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

 

ऐ बुरे वक़्त ज़रा अदब से पेश आ
क्यूंकि वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में

 

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

 

कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

 

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

 

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

 

जी ढूंढता है फिर वही फुर्सत की रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-इ-जानन किये हुए

Mirza Ghalib Shayari 👍 Mirza Ghalib Shayari
Mirza Ghalib Shayari in Hindi – मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी इन हिंदी
ज़ाहे-करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब,
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है, क्या कहिये,
समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश-ऐ-हाल,
की यह कहे की सर-ऐ-रहगुज़र है, क्या कहिये।

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई,
मारा ज़माने ने ग़ालिब तुम को,
वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई।

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं,
फिर वही जिंदगी हमारी है,
बेखुदी बेसबब नहीं गालिब,
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है।

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है,
बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब,
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है।

जरा कर जोर सीने पर की,
तीर-ऐ-पुरसितम निकले,
जो वो निकले तो दिल निकले,
जो दिल निकले तो दम निकले।

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तश्ना ए फरियाद आया,
दम लिया था ना कयामत ने हनोज़,
फिर तेरा वक्ते सफ़र याद आया।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले,
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

न सुनो गर बुरा कहे कोई,
न कहो गर बुरा करे कोई ,
रोक लो गर ग़लत चले कोई,
बख़्श दो गर ख़ता करे कोई।

मैं नादान था,
जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब,
यह न सोचा के एक दिन,
अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी।

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि,
हाँ रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।

गालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे।

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।

वक़्त मोहताज कर गया ग़ालिब,
वरना माँ के आँचल तले नवाब थे हम।

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

बिजली इक कौंध गयी आँखों के आगे तो क्या,
बात करते कि मैं लब तश्न-ए-तक़रीर भी था।

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल को ख़ुश रखने को ग़ालिब, ये ख़याल अच्छा है।

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

कभी फुर्सत हो तो इतना जरूर बताना,
वो कौन सी मोहब्बत थी, जो हम तुम्हे ना दे सके।

हमें तो रिश्ते निभाने है,
वरना वक़्त का बहाना बनाकर,
नज़र अंदाज करना हमें भी आता है।

खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो,
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के,
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।

मगर लिखवाए कोई उस को खत,
तो हम से लिखवाए,
हुई सुबह और,
घरसे कान पर रख कर कलम निकले।

इस नज़ाकत का बुरा हो, वो भले हैं तो क्या,
हाथ आएँ तो उन्हें हाथ लगाए न बने,
कह सके कौन के यह जलवागरी किस की है,
पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने।

दर्द देकर सवाल करते हो,
तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो,
देखकर पूछ लिया हाल मेरा,
चलो कुछ तो ख़याल करते हो।

इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही,
मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही,
कटा कीजिए न तालुक हम से,
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।

यादे-जानाँ भी अजब रूह-फ़ज़ा आती है,
साँस लेता हूँ तो जन्नत की हवा आती है,
है और तो कोई सबब उसकी मुहब्बत का नहीं,
बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है।

सबने पहना था बड़े शौक से कागज का लिबास,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले,
अदल के तुम न हमे आस दिलाओ,
कत्ल हो जाते हैं जंजीर हिलाने वाले।

सबर का मेरे अभी इम्तेहान जारी है,
वक़्त वो भी आएगा जब खुदा खुद कहेगा,
चल अब तेरी बारी है।

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है।

आइना आज फिर रिश्वत लेता पकड़ा गया,
दिल में दर्द था और चेहरा हँसता हुआ पकड़ा गया।

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

मैंने ताले से सीखा है, साथ निभाने का हुनर,
वो टूट गया लेकिन कभी चाभी नहीं बदली।

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।

कुछ अधूरापन था, जो पूरा हुआ नहीं,
कोई था मेरा, जो मेरा हुआ ही नहीं।

रहा गर कोई ता क़यामत सलामत,
फिर इक रोज़ मरना है हज़रत सलामत।

तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल,
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये,
कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन,
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये।

तुम न आए तो क्या सहर न हुई,
हाँ मगर चैन से बसर न हुई,
मेरा नाला सुना ज़माने ने,
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।

मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब,
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना,
मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते ग़ालिब,
अर्श से इधर होता काश के माकन अपना।

दिया है दिल अगर उस को, बशर है क्या कहिये,
हुआ रक़ीब तो वो, नामाबर है, क्या कहिये,
यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे,
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है, क्या कहिये।

फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल,
दिल -ऐ -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया,
कोई वीरानी सी वीरानी है ,
दश्त को देख के घर याद आया।

कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब,
गालियां खा के बेमज़ा न हुआ,
कुछ तो पढ़िए की लोग कहते हैं,
आज ग़ालिब गजलसारा न हुआ।

सादगी पर उस के मर जाने की हसरत दिल में है,
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है,
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा,
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है।

मरते है आरज़ू में मरने की,
मौत आती है पर नही आती,
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब,
शर्म तुमको मगर नही आती।

हालत कह रहे है मुलाकात मुमकिन नहीं,
उम्मीद कह रही है थोड़ा इंतज़ार कर।

मोह ख़त्म होते ही खोने का डर भी निकल जाता है,
चाहे दौलत हो, वस्तु हो, रिश्ते हो, या जिंदगी।

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।

फर्क नहीं पड़ता वो कितनी पढ़ी लिखी है,
माँ है वो मेरी, मेरे लिए सबसे बड़ी है।

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे,
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ-सा कहें जिसे।

यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो

अगर मेरे अल्फाज भी खूबसूरत लगते है तो सोचिये,
जिन्हे सोचकर लिखते है वो कितने खूबसूरत होंगे।

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब,
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।