मुस्कान शायरी | Muskan Shayari

Muskan Shayari

हम वहशियों का मस्कन क्या पूछता है ज़ालिम
सहरा है तो सहरा है ज़िंदाँ है तो ज़िंदाँ है !

हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है
जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या !

ज़ुल्फ़ ए मुश्कीं थी मेहरबाँ किस की
बू बसी है दिमाग़ में अब तक !

अब तो सब का तिरे कूचे ही में मस्कन ठहरा
यही आबाद है दुनिया में ज़मीं थोड़ी सी !

तरफ़ ए काबा न जा हज के लिए नादाँ है
ग़ौर कर देख कि है ख़ाना ए दिल मस्कन ए दोस्त !

बुझ गई शम्अ की लौ तेरे दुपट्टे से तो क्या
अपनी मुस्कान से महफ़िल को मुनव्वर कर दे !

नज़र में काबा क्या ठहरे कि याँ दैर
रहा है मुद्दतों मस्कन हमारा !

मुझ को जन्नत से उठा कर ये कहाँ फेंक दिया
अपने मस्कन से बहुत दूर रहूँगा कैसे !

जीने मरने का एक ही सामान
उस की मुस्कान हो गई होगी !

शम्अ माशूक़ों को सिखलाती है तर्ज़ ए आशिक़ी
जल के परवाने से पहले बुझ के परवाने के बाद !

माशूक़ों से उम्मीद ए वफ़ा रखते हो नासिख़
नादाँ कोई दुनिया में नहीं तुम से ज़ियादा !

ख़फ़ा भी हो के जो देखे तो सर निसार करूँ
अगर न देखे तो फिर भी है इक सलाम से काम !

दैर से काबा गए काबा से माबदगाह में
ख़ाक भी पाया नहीं दैर ओ हरम की राह में !

घर वाले मुझे घर पर देख के ख़ुश हैं और वो क्या जानें
मैं ने अपना घर अपने मस्कन से अलग कर रक्खा है !

छोड़ दें दैर ओ हरम कुफ़्र और इस्लाम के लोग
काबा ए दिल में जो देखें मिरे बुत ख़ाना ए इश्क़ !