नजरिया शायरी | Nazariya Shayari

Nazare Shayari | नज़रें शायरी

Nazare Shayari In Hindi | नज़रे शायरी हिंदी में

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Nazare Shayari
नजर नवाज नजारा बदल न जाए कहीं
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

मुझ को जन्नत के नजारे भी नहीं जचते हैं
शहर ए जानाँ ही तसव्वुर में बसा है साहब

जब नजारे थे तो आँखों को नहीं थी परवा
अब इन्ही आँखों ने चाहा तो नजारे नहीं थे

सब को महफिल में नसीब उन के नजारे होंगे
हम कहीं गश में पड़े एक किनारे होंगे

बर्क क्या शरारा क्या रंग क्या नजारा क्या
हर दिए की मिट्टी में रौशनी तुम्हारी है

अगर नजारा है मंजूर खस्ता हालों का
तो आओ खोल दें जूड़ा तुम्हारे बालों का

वो आ रहे हैं सँभल सँभल कर नजारा बे खुद फजा जवाँ है
झुकी झुकी हैं नशीली आँखें रुका रुका दौर ए आसमाँ है

गर्मी ए शौक ए नजारा का असर तो देखो
गुल खिले जाते हैं वो साया ए तर तो देखो

हर तरफ दावत ए नजारा है
चश्म ए हैराँ किधर किधर देखे

मैं करूँ किस का नजारा देख कर तेरा जमाल
मैं सुनूँ किस का फसाना तेरे अफ्साने के बाद

मुझे को महरूमी ए नजारा कुबूल
आप जल्वे न अपने आम करें

ऐ शौक ए नजारा क्या कहिए नजरों में कोई सूरत ही नहीं
ऐ जौक ए तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत ए जानाँ भूल गए

हम दहर के इस वीराने में जो कुछ भी नजारा करते हैं
अश्कों की जबाँ में कहते हैं आहों में इशारा करते हैं

हस्ती का नजारा क्या कहिए मरता है कोई जीता है कोई
जैसे कि दिवाली हो कि दिया जलता जाए बुझता जाए

नजर ए तगाफुल ए यार का गिला किस जबाँ सीं करूँ बयाँ
कि शराब ए सद कदह आरजू खुम ए दिल में थी सो भरी रही

हर्फ ओ बयाँ, नजारे, सितारे, दिल ओ नजर
हर शय में इंतिशार है, मंजूम कुछ नहीं

भोले भाले हैं हसीं नाज ओ अदा क्या जानें
चाहने वाले ही कम्बख्त सिखा देते हैं

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