Paravah Shayari | परवाह शायरी 357+

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काश तुम्हारी आग बुझा पाता मैं,
काश तुम्हारे दाग मिटा पाता मैं,
करनी न पड़ती परवाह ज़माने की,
काश इतनी हिम्मत जुटा पाता मैं।

 

दुनिया भूल गया मैं तुझको याद करते करते,
और तु मुझे भूल गई निया कि परवाह करते करते।

 

कर न कुछ ऐसा कि ज़माना करे तुम पर सवालात,
खुद की परवाह नहीं बस फिक्रमंद हैं तेरे ख़ातिर मेरे जज़्बात।

 

मत करो परवाह अब तुम कोई रहबर ढूँढ़ लो,
स्वतंत्र तुमको कर दिया है मुझसे बेहतर ढूंढ लो।

 

हम उनकी मोहब्बत में ज़रा बेपरवाह क्या हो गये,
वो हमें इल्ज़ाम-ए-लापरवाह दे गये।

 

ख़्वाहिशें हमारी सारी गिरवी रख लो तुम,
परवाह कर हमारी,बस ये शौक पूरी कर दो तुम।

 

वो मेरी परवाह नहीं करते,
मुझे इस बात की परवाह नही,
परवाह इस बात की है कि,
वो मेरी परवाह को परवाह नहीं समझते।

 

जो कभी भी मेरा परवाह नहीं करती थी,
आज मेरे बेपरवाह होने पर परेशान है।