Prakriti Shayari 372+ | प्रकृति शायरी

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Prakriti Shayari

हर कण से धरा पावन हो जाती;
हर रूह गर दर्पण हो जाती.

 

एक प्याला भरा रखा, ये नीर है या क्षीर है;
आसमान से उतरा मानो, मन चखने को अधीर है.

 

धरती गगन हवा पवन ये सब प्रकृति के फूल हैं,
इनके एहसास ही गुलों की खुशबू और गुलशन का उसूल हैं…

 

फिज़ा के रंग सभी अभी बरकार हैं;
जो पहुँच के पार है, वहीं पर बहार है.

 

बादलों के साये में, पर्वतों की बाहों में;
राहतें यही बसती हैं झील की पनाहों में.

 

नहीं मिलन है किसी क्षितिज पर, झील से बोला बादल;
आहें मुझ तक अश्रु तुम तक, लाता और ले जाता जल.

 

कल के बीते पल से बेहतर;
होते यादों के अक्स अक्सर.

 

हर दिशा में है उमंग, खामोशियाँ यहाँ अभंग;
सुनो! कुछ है गा रही, झंकार पर हर एक तरंग.