रोने शायरी | Rone Shayari

Rone Shayari

रोने वाले तुझे रोने का सलीक़ा ही नहीं
अश्क पीने के लिए हैं कि बहाने के लिए !

इश्क़ में ग़ैरत ए जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया !

मुझ को रोने तो दो दिखा दूँगा
बुलबुला है ये आसमान नहीं !

रोने को तो ज़िंदगी पड़ी है
कुछ तेरे सितम पे मुस्कुरा लें !

रोने से और इश्क़ में बे बाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए !

वो बअद ए मुद्दत मिला तो रोने की आरज़ू में
निकल के आँखों से गिर पड़े चंद ख़्वाब आगे !

आँखें ख़ुदा ने बख़्शी हैं रोने के वास्ते
दो कश्तियाँ मिली हैं डुबोने के वास्ते !

रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
जिन को मजबूरी ए हालात ने रोने न दिया !

रोने वाले हुए चुप हिज्र की दुनिया बदली
शम्अ बे नूर हुई सुब्ह का तारा निकला !

बुरी तक़दीर के रोने से हासिल
तलब हो गर तो वीराने बहुत हैं !

नासेह मिरे रोने का न माने हो कि आशिक़
गर ये न करे काम तो फिर काम करे क्या !

रोने के बदले अपनी तबाही पे हँस दिया
शाकिर ने इस तरह गिला ए आसमाँ किया !

शम्अ हर शाम तेरे रोने पर
सुब्ह दम तक चराग़ हँसता है !

बस कि थी रोने की आदत वस्ल में भी यार से
कह के अपना आप हाल ए आरज़ू रोने लगा !

रोने के भी आदाब हुआ करते हैं फ़ानी
ये उस की गली है तेरा ग़म ख़ाना नहीं है !

कोई रोए तो मैं बे वजह ख़ुद भी रोने लगता हूँ
अब अख़्तर चाहे तुम कुछ भी कहो ये मेरी फ़ितरत है !

रोने से एक पल नहीं मोहलत फ़िराक़ में
ये आँख क्या लगी मिरे पीछे बला लगी !

रोने पे अगर आऊँ तो दरिया को डुबो दूँ
क़तरा कोई समझे न मिरे दीदा ए नम को !

मेरे रोने की हक़ीक़त जिस में थी
एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा !