Zuban Shayari | जुबान शायरी 210+

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Zuban Shayari | जुबान शायरी

लहजे में बदजुबानी,
चेहरे पर नकाब लिए फिरते हैं,
जिनके खुद के बहीखाते बिगड़े है,
वो मेरा हिसाब लिए फिरते हैं।

 

जुबान पे उल्फत के अफसाने नहीं आते,
जो बीत गए फिर से वो फसाने नहीं आते,
यार ही होते हैं यारो के हमदर्द,
कोई फ़रिश्ते यहाँ साथ निभाने नहीं आते।

 

था जहाँ कहना वहाँ कह न पाये उम्र भर,
कागज़ों पर यूँ शेर लिखना बेजुबानी ही तो है।

 

कसूर तो था ही इन निगाहों का,
जो चुपके से दीदार कर बैठा,
हमने तो खामोश रहने की ठानी थी,
पर बेवफा ये ज़ुबान इज़हार कर बैठा।

 

बोलते रहना क्यूँकि तुम्हारी ज़बान से,
लफ़्ज़ों का ये बहता दरिया अच्छा लगता है।

 

तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने,
कितनी मीठी ज़बान है प्यारे।

 

ए मेरी कलम इतना सा अहसान कर दे,
कह ना पाई जो जुबान वो बयान कर दे।

 

जुबानी इबादत ही काफी नहीं,
खुदा सुन रहा है खयालात भी।

जुबान शायरी इन हिंदी Zuban Shayari in Hindi

बोलते रहना क्यूँकि तुम्हारी ज़बान से ,
लफ़्ज़ों का ये बहता दरिया अच्छा लगता है ।

जुबानी इबादत ही काफी नहीं ,
खुदा सुन रहा है खयालात भी ।

सब्र , तहजीब है मोहब्बत की ,
तुम समझते हो बेजुबान हूँ मैं ।

बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है ,
वरना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है ।

रिश्तो के बजार में आजकल ,
वो लोग हमेशा अकेले पाये जाते हैं साहब ,
जो दिल और जुबान के सच्चे होते हैं ।

आप आनंद ले रहे है जुबान शायरी का, अपने पढ़ना जारी रखें, Zuban Shayari संग्रह समय के साथ बढ़ा किया जायेगा।

जुबान खामोश , आँखों में नमी होगी ,
ये बस दास्ताँ ए ज़िंदगी होगी ,
भरने को तो हर ज़ख्म भर जाएंगे ,
कैसे भरेगी वो जगह जहाँ तेरी कमी होगी ।

अपनी जुबान से में दूसरों कें ऎंब बया नहीं करता
क्यूंकि ऐब मुझे में भी और जुबां औरों में भी है

आपकी मुस्कान हमारी कमजोरी है ,
कह ना पाना हमारी मजबूरी है ,
आप क्यों नहीं समझते इस जज़्बात को ,
क्या खामोशियों को ज़ुबान देना ज़रूरी है ।

तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने ,
कितनी मीठी ज़बान है प्यारे ।

अपनी जुबान से दूसरों के ऐब बयां करने से पहले ,
ये सोच लेना की ऐब तुम में भी है ,
और जुबान दूसरों के पास भी है ।

अकेले में अपने विचारो पर नियंत्रण रखिए ,
और लोगों के बीच अपने जुबां पर ।

अगर चराग़ की लौ पर ज़बान रख देता ,
ज़बान जलती भी कब तक चराग़ जलने तक ।

आजकल कहाँ जरुरत है हाथों में पत्थर उठाने की ,
तोडने वाले तो जुबान से ही दिल तोड़ देते हैं ।

नाम उसका ज़ुबान पर आते आते रुक जाता है ,
जब कोई मुझसे मेरी आखिरी ख्वाहिश पूछता है ।

मेरे लफ्ज़ों करम से तुम्हारा जिक्र नही जाता
मैं कह दूँ कि बदल गया हूँ मैं
ये झूठ जूबां से निकल कर दिल की दहलीज से लौट जाता

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लहजे में बदजुबानी ,
चेहरे पर नकाब लिए फिरते हैं ,
जिनके खुद के बहीखाते बिगड़े है ,
वो मेरा हिसाब लिए फिरते हैं ।

मशहूर राज़-ए-इश्क़ है किस के बयान से ,
मेरी ज़बान से कि तुम्हारी ज़बान से ।

मेरे लफ्ज़ों करम से तुम्हारा जिक्र नही जाता ,
मैं कह दूँ कि बदल गया हूँ मैं ,
ये झूठ जूबां से निकल कर ,
दिल की दहलीज से लौट जाता ।

जुबान कड़वी ही सही मगर दिल साफ़ रखता हूँ ,
कौन कब बदल गया सब हिसाब रखता हूँ ।

आंसू मेरे देखकर तू परेशान क्यों है ऐ दोस्त ,
ये वो अल्फाज हैं जो जुबान तक आ न सके ।

लफ्जों की दहलीज पर घायल ज़ुबान है ,
कोई तन्हाई से , तो कोई महफ़िल से परेशान है.

अधूरी दास्तान व्यक्त करती एक किताब हूँ मैं ,
अल्फ़ाज़ों से भरपूर मगर खामोश जुबान हूँ मैं ।

था जहाँ कहना वहां कह न पाये उम्र भर ,
कागज़ों पर यूँ शेर लिखना बेज़ुबानी ही तो है ।

घी वफ़ा का डालिये , शक्कर रहे जुबान ,
खूब लजीज बन जायेंगे रिश्तो के पकवान ।

जिस को दुनिया ज़बान कहती है ,
उस को जज़्बात का कफ़न कहिए ।

लफ़्ज़ों की दहलीज पर घायल जुबान है ,
कोई तन्हाई से तो कोई महफ़िल से परेशान है ।

जुबान पे उल्फत के अफसाने नहीं आते ,
जो बीत गए फिर से वो फसाने नहीं आते ,
यार ही होते हैं यारो के हमदर्द ,
कोई फ़रिश्ते यहाँ साथ निभाने नहीं आते ।

जरूरी नहीं कि हर बात लफ़्ज़ों की गुलाम हो ,
ख़ामोशी भी खुद में इक ज़ुबान होती है ।

जब से ये अक्ल जवान हो गयी ,
तब से ख़ामोशी ही हमारी जुबान हो गयी ।

इंसान एक दुकान है ,
और जुबान उसका ताला ,
ताला खुलता है तभी मालूम होता है कि ,
दुकान सोने की है या कोयले की ।

लम्बा धागा और लम्बी जुबान ,
केवल समस्यायें ही देती हैं ,
इसीलिए धागे को लपेटकर और ,
जुबान को समेटकर रखना चाहिए ।

बाहर पुलिस का डंडा ,घर में बीवी की जुबान ,
चायना वालों तुमको माफ नहीं करेगा हिंदुस्तान ।

कहते है हर बात जुबां से हम इशारा नहीं करते ,
आसमान पर चलने वाले जमीं से गुज़ारा नहीं करते ,
हर हालात को बदलने की हिम्मत है हम में ,
वक़्त का हर फैसला हम गंवारा नहीं करते ।

था जहाँ कहना वहाँ कह न पाये उम्र भर ,
कागज़ों पर यूँ शेर लिखना बेजुबानी ही तो है ।

ए मेरी कलम इतना सा अहसान कर दे ,
कह ना पाई जो जुबान वो बयान कर दे ।

दिल पे ताला , ज़बान पर पहरा ,
यानी अब अर्ज़-ए-हाल से भी गए ।

लोग , न जाने किस तरह ,
संभालेगें ये जिंदगी के रिश्ते ,
खुद की ज़रा सी जुबान तक ,
तो संभाली नहीं जाती ।

दर्द-ए-दिल उन के कान तक पहुँचा ,
बात बन कर ज़बान से निकला ।

लफ़्ज़ों के बोझ से थक जाती हैं ज़ुबा कभी कभी ,
पता नहीं खामोशी की वजह मज़बूर या समझदारी ।

कसूर तो था ही इन निगाहों का ,
जो चुपके से दीदार कर बैठा ,
हमने तो खामोश रहने की ठानी थी ,
पर बेवफा ये ज़ुबान इज़हार कर बैठा ।

अपनी जुबान से में दूसरों के ऐब बया नहीं करता ,
क्यूंकि ऐब मुझे में भी और जुबां औरों में भी है ।

हर इंसान अपनी जुबान के पीछे छुपा हुआ है ,
अगर उसे समझना चाहते हो तो उसको बोलने दो ।

जुबान का वजन बहुत कम होता है ,
पर बहुत कम लोग इसे सम्हाल पाते है ।

हर इक ज़बान को यारो सलाम करते चलो ,
गिरोह की है न फ़िरक़े की और न मज़हब की ।

रहे न जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजिए ,
कटे ज़बान तो ख़ंजर को मरहबा कहिए ।

मेरी जुबां तेरा नाम मेरे लबों पर नही आने देती ,
कहीं तुम बेचैन ना हो जाओ मेरी रूह तुम्हे बुलाने नही देती ,
जिस दिन मेरी जुबां से तुम्हारा नाम गलती से निकल जाता है ,
उस दिन मेरी नींद भी मुझे सिरहाने नहीं देती ।

इश्क ऐसी जुबान है प्यारे ,
जिसे गूंगा भी बोल सकता है ।

तेरी ज़ुबान ने कुछ कहा तो नहीं था ,
फिर ना जाने क्यों मेरी आँख नम हो गयी ।

बहुत खूब है यूँ आपका शब्दों में मुझे लिखना ,
वरना तो सबने मुझे सदा बेजुबां ही माना है ।